कलयुग में द्रौपदी को कौन बचाए
कलयुग में द्रौपदी को कौन बचाए
सारांश: यह कविता कलयुग में वर्तमान स्थिति का विचार करती है, जहां भगवान कृष्णा के प्रतीत अभाव के साथ ही स्त्रियों की दुर्दशा, जिसे द्रौपदी से प्रतिस्थित किया गया है, अभिशप्त रहती है। कविता धर्म और न्याय के पथ से लोगों के भटक जाने की व्यथा को शोक करती है। इसमें समाज में स्त्रियों के अभिमान की अवहेलना और मानव जीवन की पवित्रता की अनदेखी के बारे में सवाल उठाया गया है।
इन विचारों के बीच, कवि सभी को सभी स्त्रियों का सम्मान करने के लिए प्रेरित करता है और भगवद् गीता के ज्ञान को स्वीकार करने का आह्वान करता है। धर्म और न्याय के प्रचार में सभी को साथ मिलकर सत्य की रक्षा करने के लिए संकल्प लेने के लिए उत्साहित करता है। इस कलयुग में भगवान कृष्णा फिर से नहीं आए हैं, लेकिन हम सब मिलकर द्रौपदी को बचा सकते हैं।
कलयुग में फिर से कृष्णा नहीं आए,
अब द्रौपदी को कौन बचाए।
धर्म के पथ से अब भटक रहे हैं लोग,
भूल गए सत्य, न्याय के निर्माता योग।
कैसा है ये रामराज्य, जहां स्त्री की इज्जत कुछ भी नहीं,
कैसा है ये सभ्य समाज, जहां जान की कीमत कुछ भी नहीं।
आओ फिर से ले संकल्प, सभी स्त्रियों का करें सम्मान,
उठाएं हाथ, स्वीकार करें, बचाएं गीता का ज्ञान।
धर्म के प्रचार में जुटे हम सभी, सत्य की रक्षा में साथ मिलकर संघर्ष
करें।
कविता में सभी स्त्रियों का सम्मान करने का आह्वान किया गया है, और सभी को गीता के ज्ञान को स्वीकार करने के लिए प्रेरित किया गया है। धर्म के प्रचार में सभी मिलकर साथ मिलकर सत्य की रक्षा करने का संकल्प लेने के लिए उत्साहित किया गया है। इस कलयुग में भगवान कृष्णा नहीं आए हैं, लेकिन हम सब मिलकर द्रौपदी को बचा सकते हैं।
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